नई दिल्ली: वर्ल्ड एथलेटिक्स अंडर-20 चैंपियनशिप में भारत के लिए आशीष यादव ने भाला फेंक इवेंट में सिल्वर मेडल जीता। उनका बेस्ट थ्रो 74.09 मीटर का था। इस चैंपियनशिप में नीरज चोपड़ा के बाद वह भाला फेंक में मेडल जीतने वाले सिर्फ दूसरे एथलीट हैं। 19 साल के आशीष यूपी के मिर्जापुर जिले के मवैया के रहने वाले हैं। उन्होंने भाला फेंक में करियर बनाने के लिए काफी स्ट्रगल किया है। ट्रेनिंग करने के वह काफी खतरा उठाते थे लेकिन इसके बाद भी नीरज चोपड़ा के नक्शेकदम पर चलना चाहते थे।
आशीष ने खुद बताया अपना स्ट्रगल
लकड़ी के भाले से सूखे तालाब में आशीष प्रैक्टिस किया करते थे। उन्होंने इंडियन एक्सप्रेस से कहा, ‘घर से लगभग 2 किलोमीटर दूर एक तालाब था जो सूख जाता था। वहां मैं लकड़ी का भाला बिना इस चिंता के फेंक सकता था कि वह किसी को लग जाएगा। लेकिन वहां खतरा भी था क्योंकि कुछ जगहें दलदल जैसी थीं। हर साल बच्चों के कीचड़ में धंसने की घटनाएं होती थीं। कुछ बच्चों की मौत भी हो गई थी। जब मेरे परिवार को पता चला कि मैं कहां ट्रेनिंग कर रहा हूं, तो मुझे कई बार मार भी पड़ी। लेकिन मैं हमेशा सावधान रहता था। तालाब के पास एक शिवजी का मंदिर था, इसलिए मुझे यकीन था कि मेरी रक्षा होगी। मिर्जापुर या मेरे गांव में कोई सही मैदान नहीं था। मुझे कहीं न कहीं से तो शुरुआत करनी ही थी।’
दो साल पहले आशीष को इंस्पायर इंस्टीट्यूट ऑफ स्पोर्ट और स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया के जॉइंट सेंटर में ट्रेनिंग के लिए चुना गया था। तब उनका वजन सिर्फ 70 किलो था और लंबाई 6 फीट एक इंच। इसकी वजह से उन्हें अंडरवेट कैटेगरी में डाल दिया गया था। लेकिन कोच अरविंद कुमार ने उनमें काबिलियत दिखी और अब उन्होंने भारत के लिए मेडल जीत लिया है।
पिता की काम में मदद भी करते थे
आशीष के पिता का दूध का बिजनेस है। वह पहले खेल को लेकर सीरियस नहीं थे और पिता की काम में मदद करते थे। उन्होंने कहा, ’17 साल की उम्र तक मैं अपने पिता की मदद करता था, जो दूध बेचने का काम करते हैं। 10 साल की उम्र से ही मैं अपने गांव और उसके आस-पास के घरों में जाकर गाय और भैंस का दूध निकालता था। मेरे पिता उस दूध को बेचते थे।’
19 साल के आशीष यादव का प्रदर्शन इसलिए भी खास है क्योंकि घुटने की इंजरी के कारण उन्हें प्रैक्टिस का ज्यादा मौका नहीं मिला। हांगकांग में अंडर-20 एशियन चैंपियनशिप में पांचवें स्थान पर रहने की निराशा से भी वे मानसिक रूप से परेशान थे। वहां वह वीजा की दिक्कतों के कारण वे देर से पहुंचे थे। उन्हें शाकाहारी खाने के लिए भी चुनौतियों से जूझना पड़ा था।


