प्रशांत रायचौधरी
14 वर्ष की उम्र में वैभव सूर्यवंशी को भारतीय अंडर-19 क्रिकेट टीम का कप्तान बनाया जाना एक ऐसा फैसला है, जिसने खेल जगत में बहस छेड़ दी है। यह निर्णय साहसिक भी है और संवेदनशील भी—जिसे केवल उम्र के चश्मे से नहीं, बल्कि खिलाड़ी की क्षमता, मानसिक मजबूती और भविष्य पर पड़ने वाले प्रभावों के संदर्भ में देखना चाहिए।
एक ओर, यदि किसी खिलाड़ी में असाधारण प्रतिभा, खेल की गहरी समझ और नेतृत्व के गुण कम उम्र में ही दिखने लगें, तो उसे अवसर देना गलत नहीं कहा जा सकता। भारतीय क्रिकेट ने पहले भी सचिन तेंदुलकर, विराट कोहली और शुभमन गिल जैसे खिलाड़ियों को कम उम्र में जिम्मेदारियाँ देकर निखारा है। ऐसे फैसले युवा खिलाड़ियों में आत्मविश्वास पैदा करते हैं और वे जल्दी परिपक्व होते हैं।
लेकिन दूसरी ओर, 14 वर्ष की उम्र मानसिक और भावनात्मक विकास का बेहद नाज़ुक दौर होता है। कप्तानी का दबाव—मीडिया, चयन, प्रदर्शन और टीम की उम्मीदें—कभी-कभी प्रतिभा को निखारने की बजाय उस पर बोझ भी बन सकता है। असफलता की स्थिति में यह दबाव बच्चे के आत्मविश्वास और मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है।
इसलिए यह फैसला तभी उचित माना जा सकता है जब:
खिलाड़ी को पूरा मानसिक और भावनात्मक सहयोग मिले
कोचिंग स्टाफ और मैनेजमेंट दबाव को संतुलित रखे
कप्तानी को “स्थायी बोझ” नहीं बल्कि सीखने का अवसर माना जाए
निष्कर्षतः, 14 साल की उम्र में अंडर-19 टीम की कप्तानी देना न तो पूरी तरह गलत है और न ही पूरी तरह सही। यह फैसला जोखिम और संभावना—दोनों को साथ लेकर चलता है। यदि सही मार्गदर्शन और संरक्षण मिला, तो यह भारतीय क्रिकेट के लिए भविष्य का एक चमकता सितारा साबित हो सकता है; और यदि जल्दबाज़ी हुई, तो प्रतिभा के क्षरण का खतरा भी बना रहेगा।


